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VOL. 2, ISSUE 1 (2020)
संस्कृत पठन-पाठन के उपादानः एक विहंगावलोकन
Authors
शुभंकर मिश्र
Abstract
स्वातं़त्र्योत्तरकालीन संस्कृत-शिक्षण आंग्ल-शिक्षा के प्रभाव के फलस्वरूप कतिपय परिवर्तनों के साथ संप्रति प्रचलित एवं व्यवहृत है । पहले कभी संस्कृत शिक्षा का उद्देश्य ‘सा विद्या या विमुक्तये’ था जो व्यक्तित्व विकास की दृष्टि से आज भी पुनीत है परंतु यह अब इस भौतिकवादी परिदृश्य में ‘सा विद्या या नियुक्तये’ मात्र में परिवर्तित हो गया है । यह सत्य है कि भारत में संस्कृत शिक्षा का परिदृश्य प्राथमिक स्तर पर नगण्य है परंतु माध्यमिक एवं उच्च स्तर पर इसकी दशा एवं दिशा अपेक्षाकृत संतोषजनक है । इस क्रम में यहाँ यह तथ्य ध्यानाकर्षण योग्य है कि विदेशों में संस्कृृत-शिक्षा की दशा माध्यमिक एवं विशेषकर प्राथमिक स्तर पर आशाजनक है । यह भाषा विदेशी एवं अनिवासी भारतीयों के मध्य सोत्साहपूर्वक पढ़ी जा रही है । परंपरागत एवं आधुनिक संस्कृत शिक्षा हेतु प्रचलित नीति एवं रीति के तहत संस्कृत-शिक्षा का यह निदर्शनात्मक आकलन भाषा-विशेष के पठन-पाठन की विद्यमानता एवं इसकी दिशा को समेकित रूप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है।
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Pages:01-04
How to cite this article:
शुभंकर मिश्र "संस्कृत पठन-पाठन के उपादानः एक विहंगावलोकन". International Journal of Research in Hindi, Vol 2, Issue 1, 2020, Pages 01-04
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