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VOL. 1, ISSUE 2 (2019)
वैश्वीकरण के जन स्वास्थ्य पर बढ़ते दुष्प्रभावों पर विवेक पूर्ण विहंगम दृष्टि
Authors
विकाश प्रकाश
Abstract
स्वास्थ्य देखभाल की सुविधा प्रदान करने में भारत सरकार के मूल कर्तव्य का परित्याग करने से निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रवेश करने की क्षमता बहुत बढ़ गई है। स्वास्थ्य देखभाल और चिकित्सा देखभाल के बीच अंतर महत्वपूर्ण है और इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य देखभाल में सिर्फ चिकित्सा देखभाल, अर्थात् बीमारियों का निदान और उपचार ही शामिल नहीं है बल्कि इसमें पोषण, पेयजल और स्वच्छता सुविधाएं, अच्छे आवास और बहुत कुछ शामिल हैं। परिभाषा के अनुसार निजी चिकित्सा देखभाल तभी बच सकती है जब वह लाभदायक हो (70)/ "मुक्त-बाजार" के सभी गुणों के बावजूद, जिन्हें बढ़ा चढ़ा कर बताया जाता है। ये संपूर्ण निजी क्षेत्र सरकार द्वारा प्राप्त प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सब्सिडी के मेजबान के कारण संपन्न हो रहा है। यह विडंबना है कि एक सरकार, जो यह घोषणा करती है कि यह गरीबों के लिए "स्वास्थ्यवर्धक" स्वास्थ्य देखभाल को "आर्थिक सहायता" प्रदान करती है, निजी और कॉर्पोरेट चिकित्सा क्षेत्र को ऐसी सब्सिडी प्रदान करती है, जो विशेष रूप से अमीरों की जरूरतों को पूरा करती है(71)। इस प्रकार, बहुत ही मामूली लागत पर चिकित्सा शिक्षा प्रदान करने के बाद सरकार निजी चिकित्सा पेशेवरों और अस्पतालों को निजी अभ्यास और अस्पताल स्थापित करने के लिए रियायतें और सब्सिडी प्रदान करती है। यह देखा जा सकता है कि दिल्ली में अपोलो अस्पताल दिल्ली सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए सस्ती ज़मीन पर बनाया गया था! सरकार निजी दवा और चिकित्सा उपकरण उद्योग को प्रोत्साहन, कर अवकाश/छूट और सब्सिडी भी प्रदान करती है (72)।
स्वैच्छिक सहायता वाला क्षेत्र, जिसने स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए भी कदम रखा है, केवल उन क्षेत्रों को ध्यान केंद्रित करने और प्राथमिकता देने के लिए मजबूर किया जाता है जहां अंतर्राष्ट्रीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है - जैसे एड्स, जनसंख्या नियंत्रण, आदि (73)।
आज, पहली बार, हम चिकित्सा देखभाल क्षेत्र में पुरे संगठित कॉर्पोरेट क्षेत्र को प्रवेश करते हुए देख रहे है।जैसे-जैसे चिकित्सा का अभ्यास अधिक प्रौद्योगिकी गहन होता जा रहा है, चिकित्सा पेशेवर की भूमिका संकीर्ण होती जा रही है, और तकनीक की भूमिका बढ़ती जा रही है। इस कारण से पूरा कॉर्पोरेट घराना अब तकनीक पर ही निवेश कर रहा है ताकि मनमाने कीमत वसूल सके(74)।
सार्वजनिक स्वास्थ्य और नव-उदारवादी आर्थिक सिद्धांत के स्थापित आदर्शो के बीच स्पष्ट विरोधाभास है । सार्वजनिक स्वास्थ्य एक "सार्वजनिक लोक कल्याण " का विषय है, अर्थात् इसके लाभों को व्यक्तिगत रूप से आनंद या गणना करके नहीं किया जा सकता है, लेकिन उन लाभों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए जो जनता द्वारा आनंदित हैं। इस प्रकार सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणाम साझा मूल्य पर निर्धारित किये जाते है। और उनका संचय बेहतर रहने की स्थिति में ले जाता है।इन लोक कल्याण के विषयो के संग्रह से जीवन स्तर में सुधार आता है। मौजूदा आर्थिक नीतियां स्वास्थ्य को एक निजी कल्याण की वस्तु समझती है जो बाजार के माध्यम से पहुँचा जाता है। जबकि किसी भी सामाजिक कल्याणकारी निवेश में कटौती, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के क्रमिक विघटन के लिए जिम्मेवार है। सार्वजनिक संस्थानों में सेवा शुल्क लगाने से, गरीबों के लिए स्वास्थ्य सेवा पहुंच से बाहर हो जाती है।
स्वास्थ्य सेवा की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र को सौंपना और सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्रासंगिकत को कम करना है।दूसरी ओर निजी क्षेत्र केवल उपचारात्मक देखभाल पर ध्यान केंद्रित करता है। उदाहरण के लिए, भारत को स्वास्थ्य में अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को कम करने और अंतरराष्ट्रीय बैंकों द्वारा भारतीय उपयोगकर्ताओं से स्वास्थ्य सेवाओं की लागत वसूलने के लिए मजबूर किया गया।
अतः इससे एक बात तो सिद्ध होती है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में बाजार और उसको प्रोत्साहित करने वाली नव-उदारवादी नीतियां जिसकी शुरुआत वैश्वीकरण से हुई और आज चरम पर है आम जनता के लिए काम नही करती है। ओर इनसब नीतियों का निर्धारण राजनीति करती है इसलिए इसके पीछे की राजनीति को समझना अतिमहत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी राजनीति खुद चुने अन्यथा यह राजनीति हमे चुन लेगी और जिस दिन इसने हमे चुन लिया फिर हमें जिंदगी भर उसी के साथ रहना पड़ेगा और फिर हमारे पास न तो शिकायत के लिए ओर न ही सुनवाई के लिए भी कोई स्थान बचेगा।
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Pages:31-38
How to cite this article:
विकाश प्रकाश "वैश्वीकरण के जन स्वास्थ्य पर बढ़ते दुष्प्रभावों पर विवेक पूर्ण विहंगम दृष्टि". International Journal of Research in Hindi, Vol 1, Issue 2, 2019, Pages 31-38
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