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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 1, ISSUE 1 (2019)
सामाजिक परिवर्तन एवं वैश्वीकरण
Authors
कृष्ण कुमार तिवारी
Abstract
महान दार्शनिक अरस्तू ने भी कहा है- परिवर्तन संसार का नियम है। परिवर्तन किसी भी वस्तु, विषय अथवा विचार में समय के अन्तराल से उत्पन्न हुई भिन्नता को कहते हैं। परिवर्तन एक बहुत बड़ी अवधारणा है और यह जैविक, भौतिक तथा सामाजिक तीनों जगत में पाई जाती है किंतु जब परिवर्तन शब्द के पूर्व सामाजिक शब्द जोड़ कर उसे सामाजिक परिवर्तन बना दिया जाता है तो निश्चित हीं उसका अर्थ सीमित हो जाता है। समाज बड़ा परिवार है। अनेक परिवारों से मिलकर बनी अमूत्र्तन व्यवस्था. व्यक्ति उसकी मूत्र्त एवं जीवंत इकाई है। दोनों परस्पर निर्भर, एक-दूसरे के लिए अपरिहार्य हैं. अकेला रहना, समाज से पूरी तरह कट जाना किसी के लिए संभव नहीं है. दूसरों के साथ तालमेल बनाकर रहना उसकी विवशता है. इसलिए मनुष्य समाज की शरण में आता है. दूसरी ओर समाज चाहता है कि उसका प्रत्येक सदस्य उसके विकास के लिए वह सबकुछ करे, जो वह कर सकता है. इसके साथ ही वह स्थापित मर्यादाओं का पालन करे तथा दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दे. जीवन की तयशुदा मर्यादाओं का पालन करें. सामाजिक आचारसंहिता को भंग न होने दें, जो लोकसाहित्य, सांस्कृतिक-सामाजिक रीति-रिवाजों, संबंधों, कला संस्कारों आदि के रूप में प्रकट होती है.उदारीकरण, बाजारीकरण, खुली अर्थव्यवस्था. आर्थिक सुधार के विभिन्न नामों से वैश्वीकरण हमारे आसपास, हम सभी के घरों में पांव पसार चुका है। वैश्वीकरण का दायरा सिर्फ आर्थिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वह हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान मिटाने पर उतारू है। वैश्वीकरण के नाम पर हमारा अमेरीकीकरण कर दिए जाने का आंतरिक और बाह्य प्रयास हो रहा है। भारतीय समाज, परंपरा और संस्कृति के समक्ष यह वैश्वीकरण एक चुनौती के रूप में विद्यमान है।शब्द “’वैश्वीकरण’“ का उपयोग अर्थशास्त्रियों के द्वारा 1980 से किया जाता रहा है, हालाँकि 1960 के दशक में इसका उपयोग सामाजिक विज्ञान में किया जाता था, लेकिन 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध और 1990 तक इसकी अवधारणा लोकप्रिय नहीं हुई. वैश्वीकरणकी सबसे पुरानी सैद्धांतिक अवधारणाओं को उद्यमी से मंत्री बने एक अमेरिकी-चाल्र्स तेज़ रसेल द्वारा लिखा गया जिन्होंने 1897 में शब्द ’कॉर्पोरेट दिग्गजों’ की रचना की।
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Pages:09-15
How to cite this article:
कृष्ण कुमार तिवारी "सामाजिक परिवर्तन एवं वैश्वीकरण ". International Journal of Research in Hindi, Vol 1, Issue 1, 2019, Pages 09-15
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